अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है…
कल वो मेरी हथेली पर समा जाती थी,
आज गोदी से बाहर निकल जाती है ।
कभी मेरी ऊँगली पकड़ कर दुनिया घूमना चाहती है,
और कभी हाथ छोड़कर भाग जाती है ।
कभी डरती है, कभी डराती है,
कभी अपनी अठखेलिओं से मन बहलाती है,
उसकी मुस्कान भी अब समझदार लगने लगी है,
अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है...
उसे मालूम है उसे क्या चाहिए,
हम तो जीवन का सन्दर्भ आज तक समझ रहे हैं।
उसे मालूम है मुस्कान में जादू होता है,
हमतो लोगों से आँखें ही चुराते हैं।
उसे मालूम है कि नामुमकिन कुछ नहीं,
हम तो मुमकिन को झुठलाते हैं।
घर जब मैं परेशान आता हूँ वो समझ जाती है,
अपनी तुतली बातों से मुझे रिझाने लगी है,
अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है...
सपने पहले भी बुनता था, अब थोड़े ज़्यादा रंग हैं,
गाता पहले भी था, अब लोरियों के सुर संग हैं।
वो जबसे है कुछ अच्छा करना चाहता हूँ,
बुरा पहले भी नहीं था,
पर अब और सच्चा बनना चाहता हूँ।
क्योंकि वो सब कुछ सीखती है बिना मेरे सिखाये भी,
क्योंकि वो सब कुछ देखती है बिना मेरे दिखाए भी,
नक़ल, असल से बेहतर करने लगी है,
अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है...
डरता हूँ, ऐसे ही पलक झपकते वो बड़ी हो जाएगी,
आज मुझसे सीखती है, कल मुझे सिखाएगी।
पर कोई बात नहीं, आज तो अभी गुज़रा नहीं,
अभी तो कई कहानियां उसके लिए बुननी हैं,
अभी तो कई पैहलियाँ उसके लिए बूझनी हैं।
मासूम सवालों का जवाब आता अभी न था,
लाजवाब हो के भी खुश पहले कभी न था,
वो बेवजह बिना बात मुझे हंसाने लगी है,
अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है...
उसके साथ थिरकने से मन नहीं भरता है,
वक़्त काश थम जाये यही मन करता है।
पर कर नहीं सकता तो यादें संजो रहा हूँ,
कल की कल देखूँगा, अभी आज में जी रहा हूँ।
उसकी शैतानियों में अपना बचपन याद आता है,
ये लम्हा बेइंतहाँ हो जाए यही दिल चाहता है,
बिन कहे कुछ वो मुझे समझने लगी है,
अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है…
कल वो मेरी हथेली पर समा जाती थी,
आज गोदी से बाहर निकल जाती है ।
कभी मेरी ऊँगली पकड़ कर दुनिया घूमना चाहती है,
और कभी हाथ छोड़कर भाग जाती है ।
कभी डरती है, कभी डराती है,
कभी अपनी अठखेलिओं से मन बहलाती है,
उसकी मुस्कान भी अब समझदार लगने लगी है,
अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है...
उसे मालूम है उसे क्या चाहिए,
हम तो जीवन का सन्दर्भ आज तक समझ रहे हैं।
उसे मालूम है मुस्कान में जादू होता है,
हमतो लोगों से आँखें ही चुराते हैं।
उसे मालूम है कि नामुमकिन कुछ नहीं,
हम तो मुमकिन को झुठलाते हैं।
घर जब मैं परेशान आता हूँ वो समझ जाती है,
अपनी तुतली बातों से मुझे रिझाने लगी है,
अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है...
सपने पहले भी बुनता था, अब थोड़े ज़्यादा रंग हैं,
गाता पहले भी था, अब लोरियों के सुर संग हैं।
वो जबसे है कुछ अच्छा करना चाहता हूँ,
बुरा पहले भी नहीं था,
पर अब और सच्चा बनना चाहता हूँ।
क्योंकि वो सब कुछ सीखती है बिना मेरे सिखाये भी,
क्योंकि वो सब कुछ देखती है बिना मेरे दिखाए भी,
नक़ल, असल से बेहतर करने लगी है,
अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है...
डरता हूँ, ऐसे ही पलक झपकते वो बड़ी हो जाएगी,
आज मुझसे सीखती है, कल मुझे सिखाएगी।
पर कोई बात नहीं, आज तो अभी गुज़रा नहीं,
अभी तो कई कहानियां उसके लिए बुननी हैं,
अभी तो कई पैहलियाँ उसके लिए बूझनी हैं।
मासूम सवालों का जवाब आता अभी न था,
लाजवाब हो के भी खुश पहले कभी न था,
वो बेवजह बिना बात मुझे हंसाने लगी है,
अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है...
उसके साथ थिरकने से मन नहीं भरता है,
वक़्त काश थम जाये यही मन करता है।
पर कर नहीं सकता तो यादें संजो रहा हूँ,
कल की कल देखूँगा, अभी आज में जी रहा हूँ।
उसकी शैतानियों में अपना बचपन याद आता है,
ये लम्हा बेइंतहाँ हो जाए यही दिल चाहता है,
बिन कहे कुछ वो मुझे समझने लगी है,
अब मेरी लड़की बड़ी लगने लगी है…


Sundar :) really like the sentiment :)
ReplyDeleteThanks Archana, I usually write in English, but this one somehow flowed in Hindi... Daughters grow so fast...
ReplyDeleteBeautifully written Piyush! Can so relate to it :)
ReplyDeleteI know Priya, thanks for your comment.
DeleteAwesome one.. I just loved it and my eyes are teary. Its so true. Daughters indeed grows fast.. Can I share it?
ReplyDeleteThanks for your comment Mona, it is incredible how daughters grow! Feel free to share :) and keep visiting.
DeleteThis comment has been removed by the author.
DeleteSo well expressed poem Piyush!!!!! Loved it!!! :)
ReplyDelete